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गैर-मुस्लिमों को उनके त्योहारों पर शुभकामनाएं देने की अनुमति है अथवा नही ?

गैर-मुस्लिमों को उनके त्योहारों पर शुभकामनाएं देने की अनुमति है अथवा नही ?                                                                          खुर्शीद इमाम ************************************************** गैर-मुस्लिम भाइयों को उनके धार्मिक त्योहारों पर शुभकामनाएं देने में कोई बुराई नही है। अपितु, कुछ समय विशेष में ऐसा करने की सलाह दी जाती है जिससे वह आपके क़रीब आ सकें। कुछ मुस्लिमों द्वारा तर्क दिया जाता है कि उनको बधाई अथवा शुभकामनाएं देकर आप उन को करते हैं ना कि ईश्वर को। यह तर्क भावनाओं पर आधारित है। 1. दीन का कोई भी आदेश हमें, उनको शुभकामनाएं देने से नही रोकता है। कुछ लोग हदीस अनुसार, ईशदूत के उस आदेश से भ्रांति में पड़ जाते हैं, जिसमे उन्होंने मुसलमानों को इस्लाम से पहले के पर्वों को मनाने से रोक था। किसी पर्व को स्वयं मनाने और और अपने गैर-मुस्लिम मित्र को केवल उसकी बधाई देने में बड़ा अं...

क्या यह पूर्वनिर्धारित है कि कौन स्वर्ग अथवा नरक में प्रविष्ट होगा?

क्या ईश्वर की ओर से यह पूर्वनिर्धारित है कि कौन स्वर्ग अथवा नरक में प्रविष्ट होगा? पवित्र कुरआन 7:179 विश्लेषण खुर्शीद इमाम  ******************************************** अल-आराफ़ 7:179 "निश्चित रूप से हमने जिन्न और मनुष्यों की बहुसंख्या नरक के लिए पैदा की है। उनको बुद्धि दी है पर वो सोचते नही, उनको आंखें दी हैं पर वो देखते नही, उनको कान दिए पर वो (सत्य) सुनते नही। वह मवेशियों जैसे है; अपितु वह उस भी निकृष्ट हैं! ये बेपरवाह लोग हैं। प्रश्नकर्ता : ईश्वर कहता है उसने कुछ जिन्न और मनुष्य नरक के लिए ही बनाए हैं, तो क्या ईश्वर की ओर से यह पूर्वनिर्धारित है कि कौन स्वर्ग अथवा नरक में प्रविष्ट होगा ? ********* हमे सूरहअल-आराफ़ की कुछ आयात पढ़नी चाहिए: 180- और, ईश्वर के ही सर्वोत्तम नाम है अतः उसे ही पुकारो, और उन्हें अकेला छोड़ दो जो उसके नामों की पवित्रता का उल्लंघन करते हैं: उन्हें उनके कर्मों का फल (बदला) मिलेगा । 181- और वो लोग जिन्हें हमने सत्य के मार्गदर्शन हेतु उत्पन्न किया है, वह न्याय करेंगे। 182- और वह, जो हमारे संदेश को नकारते हैं , उनको हम अंशतः (विनाश के) स...

किस न्यूनतम दूरी की यात्रा पर, व्रत(रोज़ा) रखना वैकल्पिक है?

किस न्यूनतम दूरी की यात्रा पर, व्रत(रोज़ा) रखना वैकल्पिक है? खुर्शीद इमाम  ******************************************** यात्रा के दौरान, पवित्र कुरआन, व्रत (रोज़ा) को वैकल्पिक घोषित करता है। यात्रा के दौरान रोज़ा न रखना बेहतर माना गया है। प्रश्न यह है कि किस न्यूनतम दूरी की यात्रा में यह विकल्प उपलब्ध होता है? विद्वानों का मानना है कि यह दूरी 48 मील अर्थात 77 किलोमीटर है। इस आधार पर निम्न दो परिदृश्य पर ध्यान दें: क) मैं एक निर्धन श्रमिक हूँ, रमज़ान का महीना है और मुझे सायकिल पर एक भारी बोझ लेकर 40 किलोमीटर का सफर करना है। भारी बोझ और गरम मौसम के कारण, यह एक अत्यंत थकाने वाली यात्रा होगी। परन्तु मुझे रोज़ा रखने से छूट नही मिल सकती क्योंकि मैं 77 किलोमीटर की यात्रा नही कर रहा। ख) द्वितीय परिदृश्य में मैं एक धनी व्यक्ति हूँ, मुझे दिल्ली में एक संगोष्ठी में सम्मिलित होना है। में बंगलोर से फ्लाइट लेकर 2 घंटे में दिल्ली पहुँच जाऊंगा। एयरपोर्ट से AC कार से संगोष्ठी हॉल जो स्वयं वातानुकूलित है, में पहुँच जाऊंगा। रमज़ान का माह है परंतु में रोज़ा नही रखूंगा क्योंकि मेरी यात्रा ...

क्या परलोक का जीवन तर्क संगत है?

क्या परलोक का जीवन तर्क संगत है? खुर्शीद इमाम  ******************************************** "मैं मानवता के धर्म में विश्वास रखता हूँ।" "सर्वप्रथम एक बेहतर मनुष्य बनो, फिर..." "किसने स्वर्ग/नरक देखा है, तो हम क्यों विश्वास करें" ............................................ जब भी परलोक/आस्था/ईश्वर आदि के संबंध में वार्ता होती है, हम इस प्रकार के तर्क सुनते हैं। जो लोग इस प्रकार के तर्क प्रस्तुत करते हैं, संभवतः उनके समक्ष ईश्वर और परलोक की सच्ची अवधारणा नही रखी गई होगी। जब भी किसी प्राकृतिक अथवा मानव निर्मित वस्तु को, ईश्वर के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, एक तार्किक मस्तिष्क, ईश्वर के संबंध में इस प्रकार के विश्वास/आस्था को स्वीकार नही कर पाता। " मैं  मानवता में विश्वास रखता हूँ ।" मानवता का क्या तातपर्य है? यह निर्णय कौन करेगा कि कौन कृत्य मानवीय है या अमानवीय?  कौन नैतिक/अनैतिक के मापदंड तय करेगा? एक डाकू समझता है कि लोगों को लूटकर वह स्वयं और अपने परिवार के लिए वैधानिक अर्जन कर रहा है, परंतु लूटने वाला इसके विपरीत विचा...

परिचय: श्री सैय्यद अब्दुल्लाह तारिक़ साहब

परिचय: श्री सैय्यद अब्दुल्लाह तारिक़ साहब ******************************************* जनाब सैय्यद अब्दुल्लाह साहब, उत्तर प्रदेश के रामपुर ज़िला से हैं।  पढ़ाई से वह एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं तथा वर्ष 1987 से वह पूर्णकालिक दा'ई (आह्वाहन कर्ता) हैं। वह एक जानी मानी हस्ती हैं  जिनका सम्मान विभिन्न सम्प्रदायों को मानने वालों द्वारा किया जाता है। शांति का संदेश प्रस्तुत करना ही उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। इस जुनून ने उनको विभिन्न धार्मिक मतों की धर्म ग्रंथों के अध्ययन को बाध्य किया जिसके कारण उनको क़ुरआन, वेदों, उपनिषद, गीता, बाइबल के अनेक संस्करण, गुरु ग्रंथ साहिब तथा अनेक धर्म गुरुओं के व्याख्यानों पर ज़बरदस्त महारत हासिल है। दावत - दीन के मैदान में उनकी कामयाबी का अंदाज़ा इस हक़ीक़त से लगाया जा सकता है कि वो उन चंद  इस्लामिक उपदेशकों में से हैं जिनको सभी बड़े धार्मिक पंथों जैसे सनातन धर्म, ब्रह्म कुमारी, आर्य समाज, निरंकारी मिशन, गायत्री परिवार, मसीही समाज, आदि द्वारा, इस्लाम पर व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया जा चुका है। वर्ष 2008 में, उन्होंने, इस्लामिक रिसर्...

ग़ैर-मुस्लिमों को उनके त्यौहारों पर बधाई देना

ग़ैर-मुस्लिमों को उनके त्यौहारों पर बधाई देना - जाइज़ है? सवाल : ग़ैर-मुस्लिमों को उनके त्यौहारों पर बधाई देने का सही मसला बताएं... जैसे - हमारे ग़ैर-मुस्लिम दोस्तों को हैप्पी दीवाली कहना क्या जाइज़ है या हराम ? ******************************************** जवाब :  जहां तक मैं जानता हूं हमारे ग़ैर-मुस्लिम भाइयों को उनके त्यौहारों पर बधाई देने में कोई हर्ज नहीं है । बल्कि कभी कभी तो ये ज़रूरी भी है ताकि वो तुम्हारे करीब आ सकें । कुछ मुस्लिम बहस करेंगे कि उनको बधाई दे कर तुम अल्लाह के बजाय उन्हें खुश करने की कोशिश कर रहे हो । यह बहस सिर्फ जज़्बात की बुनियाद पर है । 1. दीन में ऐसा कुछ नहीं जो हमें उनको बधाई देने से रोके । कुछ लोग हदीस की किताब की एक रिवायत से कन्फ्यूज़ होते हैं जिसमें रसूल अल्लाह स० ने मुस्लिमों को इस्लाम से पहले वाले त्यौहारों को मनाने से मना किया है । (ईद उल फित्र और ईद उल अज़हा के अलावा) त्यौहारों को मनाने और अपने ग़ैर-मुस्लिम दोस्तों को उनकी बधाई देने में बोहोत बड़ा फर्क है । 2. पिछले साल फेसबुक पर एक पोस्ट वायरल हो रही थी जिसमें कहा गया था कि अगर एक मुस्...

क्यों खुद ही इस्लाम का मज़ाक़ उड़ाते हैं हम

क्यों खुद ही इस्लाम का मज़ाक़ उड़ाते हैं हम खुर्शीद इमाम की कलम से .... ***************************************** A . परिचय .....  ये हराम है इस्लाम में । ......... ये करने की इजाज़त ( अनुमति ) नहीं है । ................ इसको स्वीकार नहीं किया जाएगा । ......................… ये क़ुरआन और सुन्नत के खिलाफ ( विरुद्ध ) है । हमने इन बयानों को कई बार सुना है , मुस्लिम आलिमों ने भी बहुत से फतवे निकाले कई मुद्दों को लेकर , तो एक झलक इन्हीं मुद्दों पर और इन मुद्दों और बदलते माहौल पर लिए गए आलिमों के फैसलों पर । 1. कॉलर लगी शर्ट पहनना या अंग्रेज़ी का इस्तेमाल करना हराम समझा जाता था , पर अब ? ये हमने ब्रिटिश हुकूमत के दौरान करा था कि वो चीज़ें जिनसे ऐसा महसूस हो कि हम ब्रिटिश की मुशाबिहत ( नकल ) कर रहे हैं वो हराम या अवैध हैं । इसलिए शर्ट पहनना , अंग्रेज़ी का इस्तेमाल आदि हराम किया गया था । 2. कॉफी पीना हराम था .. पर अब ? कॉफी के चलन के शुर...