आस्था या अंधभक्ति?
आस्था या अंधभक्ति? सबसे बड़ा संकट धर्म नहीं... विवेक का मर जाना है। किसी भी समाज का पतन तब शुरू नहीं होता जब लोग अलग-अलग आस्थाएँ रखते हैं। उसका पतन तब शुरू होता है जब लोग सोचना छोड़ देते हैं। जब प्रश्न पूछना अपराध बन जाए... जब तर्क देना उद्दंडता कहलाए... जब प्रमाण माँगना अपमान समझा जाए... जब भीड़ का निर्णय न्याय से बड़ा हो जाए... समझ लीजिए कि समाज अपने सबसे खतरनाक दौर में प्रवेश कर चुका है। इतिहास गवाह है— हर अत्याचार से पहले विवेक की हत्या हुई है। हर अन्याय से पहले सत्य को दबाया गया है। हर उत्पीड़न से पहले लोगों को सोचने से रोका गया है। धीरे-धीरे झूठ को सत्य घोषित कर दिया जाता है। भावनाओं को प्रमाण से ऊपर बैठा दिया जाता है। अंधानुकरण को श्रद्धा का नाम दे दिया जाता है। और फिर... अन्याय सामान्य लगने लगता है। यदि किसी निर्दोष के साथ अत्याचार हो... तो लोग यह नहीं पूछते कि "क्या यह न्याय है?" वे केवल यह देखते हैं कि "पीड़ित कौन है?" यहीं से सभ्यता का पतन आरम्भ होता है। न्याय का कोई धर्म नहीं होता। सत्य किसी भीड़ का मोहताज नहीं होता। और विवेक किसी सम्प्रदाय की जागीर नही...