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परिचय: श्री सैय्यद अब्दुल्लाह तारिक़ साहब

परिचय: श्री सैय्यद अब्दुल्लाह तारिक़ साहब ******************************************* जनाब सैय्यद अब्दुल्लाह साहब, उत्तर प्रदेश के रामपुर ज़िला से हैं।  पढ़ाई से वह एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं तथा वर्ष 1987 से वह पूर्णकालिक दा'ई (आह्वाहन कर्ता) हैं। वह एक जानी मानी हस्ती हैं  जिनका सम्मान विभिन्न सम्प्रदायों को मानने वालों द्वारा किया जाता है। शांति का संदेश प्रस्तुत करना ही उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। इस जुनून ने उनको विभिन्न धार्मिक मतों की धर्म ग्रंथों के अध्ययन को बाध्य किया जिसके कारण उनको क़ुरआन, वेदों, उपनिषद, गीता, बाइबल के अनेक संस्करण, गुरु ग्रंथ साहिब तथा अनेक धर्म गुरुओं के व्याख्यानों पर ज़बरदस्त महारत हासिल है। दावत - दीन के मैदान में उनकी कामयाबी का अंदाज़ा इस हक़ीक़त से लगाया जा सकता है कि वो उन चंद  इस्लामिक उपदेशकों में से हैं जिनको सभी बड़े धार्मिक पंथों जैसे सनातन धर्म, ब्रह्म कुमारी, आर्य समाज, निरंकारी मिशन, गायत्री परिवार, मसीही समाज, आदि द्वारा, इस्लाम पर व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया जा चुका है। वर्ष 2008 में, उन्होंने, इस्लामिक रिसर्...

ग़ैर-मुस्लिमों को उनके त्यौहारों पर बधाई देना

ग़ैर-मुस्लिमों को उनके त्यौहारों पर बधाई देना - जाइज़ है? सवाल : ग़ैर-मुस्लिमों को उनके त्यौहारों पर बधाई देने का सही मसला बताएं... जैसे - हमारे ग़ैर-मुस्लिम दोस्तों को हैप्पी दीवाली कहना क्या जाइज़ है या हराम ? ******************************************** जवाब :  जहां तक मैं जानता हूं हमारे ग़ैर-मुस्लिम भाइयों को उनके त्यौहारों पर बधाई देने में कोई हर्ज नहीं है । बल्कि कभी कभी तो ये ज़रूरी भी है ताकि वो तुम्हारे करीब आ सकें । कुछ मुस्लिम बहस करेंगे कि उनको बधाई दे कर तुम अल्लाह के बजाय उन्हें खुश करने की कोशिश कर रहे हो । यह बहस सिर्फ जज़्बात की बुनियाद पर है । 1. दीन में ऐसा कुछ नहीं जो हमें उनको बधाई देने से रोके । कुछ लोग हदीस की किताब की एक रिवायत से कन्फ्यूज़ होते हैं जिसमें रसूल अल्लाह स० ने मुस्लिमों को इस्लाम से पहले वाले त्यौहारों को मनाने से मना किया है । (ईद उल फित्र और ईद उल अज़हा के अलावा) त्यौहारों को मनाने और अपने ग़ैर-मुस्लिम दोस्तों को उनकी बधाई देने में बोहोत बड़ा फर्क है । 2. पिछले साल फेसबुक पर एक पोस्ट वायरल हो रही थी जिसमें कहा गया था कि अगर एक मुस्...

क्यों खुद ही इस्लाम का मज़ाक़ उड़ाते हैं हम

क्यों खुद ही इस्लाम का मज़ाक़ उड़ाते हैं हम खुर्शीद इमाम की कलम से .... ***************************************** A . परिचय .....  ये हराम है इस्लाम में । ......... ये करने की इजाज़त ( अनुमति ) नहीं है । ................ इसको स्वीकार नहीं किया जाएगा । ......................… ये क़ुरआन और सुन्नत के खिलाफ ( विरुद्ध ) है । हमने इन बयानों को कई बार सुना है , मुस्लिम आलिमों ने भी बहुत से फतवे निकाले कई मुद्दों को लेकर , तो एक झलक इन्हीं मुद्दों पर और इन मुद्दों और बदलते माहौल पर लिए गए आलिमों के फैसलों पर । 1. कॉलर लगी शर्ट पहनना या अंग्रेज़ी का इस्तेमाल करना हराम समझा जाता था , पर अब ? ये हमने ब्रिटिश हुकूमत के दौरान करा था कि वो चीज़ें जिनसे ऐसा महसूस हो कि हम ब्रिटिश की मुशाबिहत ( नकल ) कर रहे हैं वो हराम या अवैध हैं । इसलिए शर्ट पहनना , अंग्रेज़ी का इस्तेमाल आदि हराम किया गया था । 2. कॉफी पीना हराम था .. पर अब ? कॉफी के चलन के शुर...