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रमजान के बारे में भारतीयों को क्या पता होना चाहिए?

रमजान के बारे में भारतीयों को क्या पता होना चाहिए? खुर्शीद इमाम ************************************************************ अरबी कैलेंडर के अनुसार रमजान एक महीने का नाम है। यह पवित्र माह है, चारो ओर आध्यात्मिकता का वातावरण होता है। इस महीने में मुसलमान सूर्योदय से सूर्यास्त तक रोजा रखते हैं। पवित्र कुरान - ईश्वर का अंतिम ग्रंथ - इस माह में अवतरित होना आरम्भ हुआ।  उपवास के दौरान - खाना, पीना मना है, और कोई भी बुरा कार्य वर्जित है। "हे ईश्वर के विश्वासियों ! उपवास तुम्हारे लिए निर्धारित किआ गया है जैसा की तुमसे पूर्व के लोगों के लिए निर्धारित किया गया था, ताकि तुम ईश्वर के भक्त बन सको।" कुरान 2:183 पैगंबर मुहम्मद ने कहा - "वास्तव में, उपवास केवल खाने-पीने से नहीं है। बल्कि, उपवास घमंड और अश्लीलता से भी है। यदि कोई तुम्हें गाली देता है या तुम्हारे विरुद्ध मूर्खता करता है, तो कहो: वास्तव में, मैं उपवास कर रहा हूँ।" उपवास हमारे विचारों, इच्छाओं और कार्यों को नियंत्रित करने और प्रशिक्षित करने का एक माध्यम है। याद रखें: उपवास न तो भोज है और न ही भूखा रहना। ईश्वर के प्रेम...

अज़ान का अर्थ

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  अज़ान का अर्थ ●  अल्लाहु अकबर, (2 बार)                     ‘अल्लाह (ईश्वर) सबसे बड़ा है।’ ●  अश्हदुअल्ला इलाह इल्ल्अल्लाह,  (2 बार)                     ‘मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह (ईश्वर) के सिवाय कोई उपास्य नहीं।’ ●  अश्हदुअन्न मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह,  (2 बार)                     ‘मैं गवाही देता हूं कि (हज़रत) मुहम्मद, अल्लाह (ईश्वर) के रसूल (दूत) हैं।’ ●  हय्या अ़लस्-सलात, (2 बार)                     ‘(लोगो) आओ नमाज़ की ओर’ ●  हय्या अ़लल-फ़लाह, (2 बार)                     ‘(लोगो) आओ सफलता की ओर’ ●  अल्लाहु अकबर  (2 बार)                     ‘अल्लाह...

हिन्दुओं के पूर्वज कौन थे ?

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हिन्दुओं के पूर्वज मुसलमान थे? *************************************************** पिछले कुछ वर्षों से भारत मे नफरत की राजनीति अपने चरम सीमा पे है। इसी का हिस्सा है एक दुष्प्रचार जिसमे भारतीय हिन्दुओं को ये बता के भ्रमित किय जा रहा है कि भारतीय मुसलमान के पूर्वज हिंदू थे। भोले भाले लोग इस विषय को आपसी नफरत का विषय बना लेते है। 1. भारतीय कौन है? जो भारत का है वो भारतीय है। भारत मे कौन है: सनातन धर्मी, मुस्लिम, बौद्ध, जैन, सिख, ईसाई, नास्तिक, आदिवासी, लिंगायत इत्यादि। भारत का इतिहास कितना पुराना है? 1000 वर्ष, 5000 वर्ष यह शायद उससे भी पुराना। सदियों तक बौद्धों ने भारत पे राज किया। कभी छोटे छोटे राज्यों मे बंटे हिन्दुओं ने, कभी मुसलमानों ने राज किया, कभी अंग्रेजों का शासन रहा। पिछले कुछ वर्षों से ब्राह्मणों की हुकूमत है।  भारत केवल एक सीमा का नाम नही है। ये सीमा तो बदलती रही है। कभी भारत के अंदर ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, बर्मा, भूटान, कंबोडिया, मलेशिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड भी आता था। बाद म...

ईशदूत यूनुस की कहानी के 4 सबक

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  ईशदूत यूनुस की कहानी के 4 सबक 1. आपने पापों को पहचानो और क्षमा मांगो। जब मछली समुद्र की गहराई में उतरी तो ईशदूत यूनुस को अपनी गलती का आभास हुआ, वह मछली के पेट मे ही माथे के बल झुक गए और ईश्वर से क्षमायाचना की। 2. ईश्वर की दया से निराश मत होना। ना तो उन्होंने अपने दुर्भाग्य का रोना रोया और ना ही हिम्मत हारी। बल्कि उन्होंने आपने हाथ ईश्वर की ओर उठा दिए। "तो हमने उनकी विपत्ति को हटा कर उत्तर दिया। इसी प्रकार हम आस्थावान लोगों की सहायता करते हैं।" (क़ुरआन 21:88) 3. दावाह के कार्य मे धैर्य का महत्व। तुम्हारे परिश्रम का फल मिलने में समय लगेगा। यह भी सम्भव है कि तुम्हारे करीब के लोग भी सत्य को स्वीकार ना करें जबकि तुम वर्षों से उनतक संदेश पोहचा रहे हो। इसका अर्थ यह नही कि तुम हतोत्साहित होकर अपने प्रयास बन्द कर दो। 4.स्मरण (ईश्वर की याद) और प्रार्थना (ईश्वर से सहायता मांगना)  तुम्हारे सबसे उपयोगी हथियार हैं। ईशदूत यूनुस को अनुभूति हुई कि समुद्र के तल में भी जीव जन्तु ईश्वर का गुणगान कर रहे थे। यह ईश-स्मरण और प्रार्थना के लिए उनकी याद-दिहानी थी। ईश्वर के आदेशों की अवहेलना में तुम जि...

हमें ईश्वर से भय करना चाहिए अथवा प्रेम?

हमें ईश्वर से भय करना चाहिए अथवा प्रेम ?  प्रश्न: हमें ईश्वर से भय करना चाहिए अथवा प्रेम?  मेरी व्यक्तिगत मान्यता है कि "भय", आज्ञाकारिता की दिशा में पहला कदम है। ************************* उत्तर: अरबी शब्द "तक़वा" का अनुवाद प्रायः 'डर' के रूप में किया जाता है।  'वाओ', 'क़ाफ़', 'या' की मूल धातु 'प्रेम / भक्ति' को इंगित करती है। ईश्वर का भय वैसा नही है जैसा जानवरों, भूत या बुरे लोगों का होता है। ईश्वर से प्रेम किया जाता है। जब किसी से प्रेम एक सीमा से अधिक हो जाता है तो "डर/भय" स्वतः जन्म लेता है।  यह डर/भय किसी डरावनी वस्तु के डर से भिन्न, "प्रेम की पराकाष्ठा" से उतपन्न होती है।  यह डर, अपने प्रेमी के नाखुश हो जाने का है।  यह भय या असुरक्षा की भावना, प्रेमी की आज्ञा की अवहेलना से रोकता है। यही प्रेम और भय का मिश्रण "तक़वा" है जिसका क़ुरआन आदेश देता है। "...वह जो आस्था रखते हैं वह ईश्वर से अत्यधिक प्रेम करते हैं।" क़ुरआन 2:165 क़ुरआन कहता है कि आस्थावान लोग ईश्वर की भक्ति या प्रेम में लीन रहते ...

मैं विज्ञान में विश्वास करता हूँ। मुझे धर्म अथवा ईश्वर की क्या आवश्यकता है?

मैं विज्ञान में विश्वास करता हूँ। मुझे धर्म अथवा ईश्वर की क्या आवश्यकता है? ****************************************************** ईश्वर के बनाए नियम को जब हम खोज लेते हैं तो उसे विज्ञान कहते है। जितना हम इन नियमों पर मनन करते हैं - उतना ही हम मानवीय जीवन को बेहतर बना पाते हैं। विज्ञान हमारे दैनिक जीवन मे बहुत सहायक है। हमारी अलार्म घड़ी से चिकित्सीय दवाओं तक, सब विज्ञान ही है। वहीं दूसरी ओर विज्ञान की भी अपनी सीमाएं हैं। यह विज्ञान के साथ बड़ा अन्याय होगा कि हम जीवन के हर क्षेत्र में उससे दिशा निर्देश की अपेक्षा रखें। अपितु समग्र मानवीय ज्ञान के प्रकाश में यह हमसे अपेक्षित है कि हम विज्ञान की दिशा का निर्धारण करें। यह विज्ञान का स्वभाव/उद्देश्य नहीं कि वह हमें मानसिक और भावनात्मक रूप से एक बेहतर मनुष्य बनाने की दिशा में योगदान दे। उदाहरण स्वरूप : विज्ञान, सदाचार,  नैतिक मूल्यों, अथवा सामाजिक व्यवहार को विषय नहीं बनाता। माता-पिता का आज्ञापालन, पति/पत्नी में प्रेम, बच्चों का लालन-पालन, असहाय की सहायता को प्रेरित करना - ये सब विज्ञान के विषय-क्षेत्र में नहीं है। ...

सूर्य एवं चन्द्रमा हमें लाभ देते हैं तो क्या हम उनकी उपासना कर सकते हैं?

सूर्य एवं चन्द्रमा हमें लाभ देते हैं तो क्या हम उनकी उपासना कर सकते हैं? *************************************** विभिन्न परिस्थितियों के लिए विभिन्न शब्द एवं विभिन्न व्यवहारों का चयन होता है। सम्मान, प्रेम, स्नेह, समर्पण, प्रशंसा, श्रद्धा - आदि शब्दों का विभिन्न परिस्थितियों में प्रयोग होता है। हम अपने माता पिता से प्रेम और सम्मान करते हैं। किसी क्रिकेटर अथवा किसी साहसी व्यक्ति की प्रशंसा की जाती है। परन्तु यह लोग हमारे माता-पिता का जगह नहीं ले सकते। हम इनसे उस प्रकार प्रेम नही कर सकते जैसे अपने माता-पिता से करते हैं। हम अपने पति/पत्नी से प्रेम करते हैं परन्तु वैसा ही प्रेम हम पड़ोसी से नही करते हैं। हम ईश्वर के समक्ष समर्पित होते हैं। हमारा सम्पूर्ण जीवन ईश्वर के मार्गदर्शन में व्यतीत होना चाहिए। ईश्वर का जगह कोई और नहीं ले सकता। हम पशुओं के प्रति भी स्नेह की भावना रखते हैं परन्तु यह स्नेह   हमारे सन्तान के प्रति स्नेह से निश्चित रूप से भिन्न होता है। हम फूलों, पक्षियों, आकाश, सागर, पर्वत, सूर्य, चंद्रमा, आदि की सुं...